"परमाणु बम की राजनीति, अमेरिका की सनक और सूडान की अनदेखी अफगानिस्तान की
हकीकत पर एक तीखा विश्लेषण। क्या दुनिया वास्तव में सुरक्षित है या सिर्फ ताकतवरों
का खेल चल रहा है? पढ़िए state of deception की
कलम से।
कल शाम जब यह खबर आई कि अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान के परमाणु
प्रोग्राम पर हमला कर दिया है, तो यह साफ हो गया कि दुनिया किस खतरनाक
मोड़ पर खड़ी है। यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि उस Nuclear Hypocrisy का सबसे नंगा रूप है जिसे अमेरिका
सालों से पाल रहा है।
दोहरे मापदंड
आज अमेरिका और उसके साथी देश, जो खुद हजारों
परमाणु बमों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, दुनिया को शांति का उपदेश देते हैं।
अमेरिका की असल चिंता विश्व शांति नहीं, बल्कि
अपना वर्चस्व बनाए रखना है। वह चाहता है कि खाड़ी देशों में सिर्फ उसके चाटुकार देश (सऊदी, कतर, बहरीन) ही रहें,
जो
उसकी जी-हुजूरी करें और उससे हथियार खरीदें।
ईरान का गुनाह सिर्फ इतना है कि वह इस दबाव के आगे झुकने को तैयार
नहीं है। इज़राइल को डर है कि अगर किसी और के पास परमाणु ताकत आई, तो
मिडिल ईस्ट में उसकी मनमानी खत्म हो जाएगी। इसी डर और सनक के
चलते ईरान के न जाने कितने वैज्ञानिकों और प्रमुख लोगों को रास्ते से हटा दिया गया।
लोकतंत्र का झूठा नाटक
अमेरिका और उसके सहयोगी अक्सर कहते हैं कि वे वहां की सरकार खत्म कर लोकतंत्र लाना चाहते हैं। यह सरासर झूठ है। हकीकत यह है कि अगर ईरान आज घुटने
टेक दे और अमेरिका की गुलामी स्वीकार कर ले, तो ये लोग कभी
लोकतंत्र का नाम भी नहीं लेंगे।
शक्तिशाली देश बिना परमाणु बम वाले देशों पर हमला करके कहते हैं कि
"बम मत बनाओ।" यह और सीधा
संदेश है कि — "अगर
आपके पास परमाणु बम नहीं है, तो आपका राष्ट्रपति सुरक्षित नहीं है,
आपका
देश कभी भी कब्जे में लिया जा सकता है।
अफगानिस्तान
की हकीकत
अमेरिका अक्सर 'लोकतंत्र' और 'मानवाधिकार' की दुहाई देता है, लेकिन इसकी असलियत अफगानिस्तान में देखी जा सकती है। जब तक
अमेरिका को वहां अपना स्वार्थ दिखा, वह वहां रहा। जैसे ही उसका काम निकला, वह पूरे देश को तालिबान के भरोसे छोड़कर भाग गया।
आज वहां लड़कियों की शिक्षा बंद है, महिलाओं के हक छीने जा चुके हैं, लेकिन दुनिया खामोश है। क्यों? क्योंकि अब वहां अमेरिका का
कोई फायदा नहीं बचा। ईरान में 'हिजाब' पर शोर मचाने वाली दुनिया अफगानिस्तान की चीखों पर बहरी हो जाती है। यह साबित करता
है कि इनका मकसद लोकतंत्र नहीं, बल्कि
अपनी पसंद की सत्ता बिठाना है।
जब हम ईरान और मिडिल ईस्ट की जंग पर बहस कर रहे होते हैं, तब
अफ्रीका का एक देश सूडान चुपचाप जल रहा
होता है। वहाँ दो जनरलों की सत्ता की सनक ने
पूरे देश को नरक बना दिया है। लाखों लोग बेघर हैं, हज़ारों का
कत्लेआम हो चुका है।
लेकिन सूडान के पास परमाणु बम नहीं है, इसलिए वह
अमेरिका या यूरोप के लिए 'खतरा' नहीं है। वहां
सिर्फ इंसान मर रहे हैं, और बड़े देशों की नज़र में 'इंसानों
की जान' की कीमत 'परमाणु सुरक्षा' से बहुत कम है। सूडान का हाल देखकर
साफ़ हो जाता है कि दुनिया की बड़ी ताकतें आग
बुझाने वाली नहीं, बल्कि आग लगाने वाली हैं—बशर्ते उस आग में उनका मुनाफा होता रहे।
दुनिया को हथियारों का नशा अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ही चढ़ाया
है। वे खुद नए-नए हथियार तैयार कर रहे हैं और दूसरों से उम्मीद करते हैं कि कोई
उनके पीछे न आए। मानवीय फितरत है कि वह शक्ति की पूजा करती है, ऐसे
में हर छोटा देश अब या तो डरेगा या चुपचाप परमाणु प्रोग्राम में लग जाएगा।
अमेरिका की इसी 'सनक' का नतीजा है कि
आज दुनिया उस मोड़ पर है जहाँ ये घातक टेक्नोलॉजी आतंकवादियों के हाथ लग सकती है।
जो देश खुद हथियारों की जंग का जिम्मेदार है, वह किसी को कैसे
रोक सकता है?
मुझे भारत की बदलती रक्षा नीति से भी गहरी असहमति है। अपनी रक्षा के
लिए हथियार बनाना समझ आता
है, पर अब हम हथियारों के बड़े निर्यातक बनने
की दौड़ में हैं। कल अगर हमारे बेचे हुए हथियारों से कोई मासूम मारा गया, तो
उसका जिम्मेदार कौन होगा? हमें
गर्व मेडिसिन और एजुकेशन में होना चाहिए था, न कि मौत के
सामान बेचने में। हमारे यहाँ अस्पताल में जगह न मिलने से लोग मर रहे हैं, बुनियादी
ढांचा टूटा हुआ है। शौचालय
का पानी पीकर लोग में रहे हैं। हॉस्टल और अनाथालयों में बच्चियों को देह व्यापार में धकेला जा रहा
है। धर्म
के ठेकेदार और नेता इस देश में धार्मिकता का जहर बो रहे हैं और बाहर से 'चमकीला कवर' ओढ़कर दुनिया से हम अपनी दरारें छिपा
रहे हैं।
In the last
शक्ति की यह अंधी दौड़ खत्म होनी चाहिए। हम मानवता को पहाड़ी की उस
ऊँचाई पर ले जा रहे हैं जहाँ से नीचे आने का कोई रास्ता नहीं है, सिवाय
गिरकर मरने के। आज नहीं तो कल, किसी बड़े देश की 'सनक'
पूरी
दुनिया को ले डूबेगी ।
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार
हैं। इनका उद्देश्य किसी देश या संगठन की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि
वैश्विक नीतियों और मानवता के भविष्य पर एक स्वतंत्र चर्चा शुरू करना है।
